Aug 01

मीर बहादुर अली मरहूम दालान इमामबाड़ा की यह है रौशन तारीख

जौनपुर। दोस्तों जौनपुर आजादारी का मरकज बाजार भुआ मोहल्ला में मौजूद इमामबाड़ा मीर बहादुर अली मरहूम जो दालान के इमामबाड़े के नाम से जाना जाता है। उसकी तारीख बहुत ही रौशन है। हालांकि कुछ तथाकथित ब्लॉगर ने इस रौशन और वाजए तारीख से छेड़छाड़ करने की कोशिश की है। इसलिए हम इमामबाड़े की रौशन तारीख को और वाजए तरीके से बताने की कोशिश कर रहे हैं। जहां तक मेरा ख्याल है शिराजएहिंद के बुजुर्ग इस वाजए तारीख से वाकिफ हैं। हमारी कोशिश बस इतनी है कि हमारे नौवजवान साथी भी इसे जान लें। ताकि किसी की तरफ से उल्टीसीधी तारीख को अस्ल न समझ लें, क्योंकि कुछ लोग अपने नामनामे के लिए तारीख से छेड़छाड़ कर रहे हैं, जिसे कतई सही नहीं ठहराया जा सकता है।




इमामबाड़ा मीर बहादुर अली मरहूम

अजादारी के लिए हाकिमएकिला से लिया मोर्चा
जैसा की मीर बहादुर अली मरहूम की खानदान के बुजुर्ग सैयद अली मोहम्मद बहादुर और सैयदअलमदार हुसैन रिजवी ने बताया कि, बात उस वक्त की है जब आलमगीर बाहदशाह का जामाना था। उस वक्त हमारी खानदान के मुर्शिदे आला सैयद अली अकबर आलमगीर की फौज के कमांडर इन चीफ हुआ करते थे। वह आजादारी करने के लिए हमेशा मोहर्रम में अपने वतन आते थे। उस वक्त में जौनपुर का ​का हाकिमएकिला सैय्यदी गुलाम इब्ने सय्यदी याकूब था। उसने हुक्म दिया कि जौनपुर में इस बार कोई ताजियादारी नहीं होगी। न ही किसी को नक्कारा बजाने की इजाजत दी। उसका हुक्म था कि जो भी ताजियादारीमोहर्रमदारी करे उसका सिर कलम करकेकिला के दरवाजे पर टांग दिया जाए। ऐसे में पांच मोहर्रम तक शहरएजौनपुर में मजलिसऔर मातम का सिलसिला मुल्तवी यानि रुकारहा। छह मोहर्रम को शाम पांच बजे के करीब सैयद अली अकबर दिल्ली से जौनपुर पहुंचे। उन्हें जब इस बात कीइत्तला हुई तो उन्हें बहुत रंज हुआ और उन्होंने अजादारी करने का फैसला किया। उन्होंने ऐलान कर दिया कि वह ताजिया भी रखेंगे और मजलिस भी करेंगे। छह मोहर्रम की शब में मजलिस हुई। इसके बाद सात मोहर्रमको इमामबाड़ा दालान पर 1955 तक मौजूद रहे इमलीके पेड़ पर नक्कारा बंधवाया गया।सैयद अली अकबर ने अपने दामाद को हुक्मदिया कि नक्कारे पर चोट करें। इसके बाद उन्होंने मय्यत का गुस्ल किया और कफन पहन लिया। नक्कारे की आवाज शहर में गूंज उठी। इसकी खबर हाकिमएकिला तक पहुंच गई। उसने एक घोड़ सवारों की टुकड़ी ताजियादारी रोकने और सैयद अली अकबर को बुलाने के लिए भेजा। इधर सैयद अली अकबर शियों के बड़े मजमे के साथ किला की तरफ तुर्बत लेकर बढ़ रहे थे। हाकिमएकिला की घोड़ सवारों की टुकड़ी दालान इमामबाड़ा से कुछ दूरी पर ही मिल गई। इसके बाद सैयद अली अकबर के हमराह जो लोग थे, वह जान की डर की वजह से भाग गए। घोड़ सवारों की टुकड़ी ने हाकिमएकिला का हुक्म सैयद अली अकबर को बताया तो उन्होंने कहा कि वह आहिस्ताआहिस्ता किला ही आ रहे हैं। घोड़ सवारों की टुकड़ी किला की जानिब लौटी तो लेकिन किला नहीं पहुंची। इसके बाद हाकिमएकिला ने दूसरी टुकड़ी भेजी। दूसरी टुकड़ी भी वापस जब नहीं लौटी तो हाकिमएकिला खुद अपनी फौज के साथ सैयद अली अकबर यानि, इमामबाड़ा मीर बहादुर अली दालान की तरफ बढ़ा। सैयद अली अकबर अब सिर्फ कुछ साथियों के साथ किला की ओर गामज़न थे। अभी हम्माम दरवाजा पहुंचे ​थे कि हाकिमएकिला वहां पहुंच गया। अब जो हाकिमएकिला ने देखा। उसे अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हुआ। उसकी आंखों ने देखा कि सैयद अली अकबर के साथ एक बड़ी फौज चल रही है। उसके आगेआगे दो नकाबपोश रुहानी शख्सियत भी है। उसे गश आ गया और वह बेहोश हो गया। जब कुछ देर के बाद उसकी आंख खुली तो वह सैयद अली अकबर के बगलगीर हुआ फिर तुर्बत के हमराह इमामबाड़ा मीर बहादुर अली मरहूम दालान पहुंचा।




हाकिमएकिला ने कराई मुनादी
इसके बाद हाकिमए किला ने आजादारी की मुनादी कराई। शहरएजौनपुर में जोशओखरोश के साथ अजादारी होने लगी। आजादारी में लोग बढ़चढ़कर हिस्सा लेने लगे। सैयद अली अकबर के इस हौसले की चारो ओर तारीफ हुई। हर कोई उनकी बहादुरी की तारीफ करने लगा। यहां आपको हम बता दें कि सैयद अली अकबर, मीर बहादुर अली मरहूम के दादा थे। जिनके नाम से आज इमामबाड़ा दालान जाना जाता है। सैयद अली अकबर के जमाने में बस इमामबाड़े शक्ली एतेबार से छोटा था। जिसे बाद में इसी खानदान के लोगों ने और बड़ा बनवाया। मीर बहादुर अली के वालिद मोहतरम गुलाम अमीर थे। मीर बहादुर अली के बेटे गुलाम हुसैन और फिर उनके तीन बेटे मोहम्मद हुसैन, जाकिर हुसैन और फिर मोहम्मद हाशिम थे। आपको यह भी बताना जरूरी है कि सैयद अली अकबर ने जो एहतेजाजी जुलूस किला जाने के लिए निकाला था। उसकी याद आज भी ताजा है। गश्ती जुलूस के तौर पर शबएआशूर को तुर्बत निकाली जाती है।

इमामबाड़े में सालभर होती है अजादारी
दोस्तों यहां एक और बात बताना चाहता हूं। जिससे आप सब वाकिफ हैं। इमामबाड़े का मकसद जो मैं समझता हूं। यह है कि वहां अजादारी हो। ऐसे में मीर बहादुर अली मरहूम दालान के इमामबाड़े में मोहर्रम के अलावा सालभर अजादारी होती है। इमामबाड़े में खानदान के लोग आज भी बहुत ही जोशओखरोश के साथ अजादारी करते हैं। यहां हर माह की पहली जुमेरात को नौंचदी का जुलूस भी उठता है। मेरे ख्याल से तथा​कथित ब्लॉगर को इन बातों को लोगों तक अपने ब्लॉग के जरिए पहुंचाना चाहिए न कि झूठी बातें, जो उन्होंने अपने ब्लॉग के जरिए पहुचाई है।

(सै.ख़ादिम अब्बास रिज़्वी)